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वाराणसी के तीर्थ

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वाराणासी बहूत प्राचीन नगरी है । जो आजकल बहुत चर्चा मे रहती है । वाराणसी का एक नाम काशी भी है । वाराणसी मे बहुत सारे तीर्थस्थल एवम धार्मिक मन्दिर है । वाराणसी को शिव जी का वरदान है की यहा जो भी प्राणी मरेगा वह जीवन और मरण के बन्धन से मुक्त हो जाएगा, उसे संसार मे जन्म नही लेना पड़ेगा । चाहे कोई पशु पक्षी या चीटी ही क्यू ना हो वह संसार मे जन्म नही लेगा । वह सदा के लिए मुक्त हो जाएगा । वाराणसी मे कुछ प्रसिद्ध तीर्थस्थल है जिसका दर्शन करने के लिए देश विदेश से लाखो लोग आते है । जैसे - काशी विश्वनाथ मन्दिर-  काशी विश्वनाथ मन्दिर बहुत प्रचीन है । इसका निर्माण कूछ समय पूर्व अहिल्याबाई ने कीया था । वर्तमान समय मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इसको नया रूप दिया गया । इस मन्दिर का दर्शन करने के लिए देश विदेश से  लाखों की संख्या मे लोग आते है । इस मंदिर का दर्शन करने से भक्त की सारी मनोकामना पूर्ण हो जाती है । कालभैरव मन्दिर- काल भैरव मंदिर भी वाराणसी का प्राचीन मंदिर है । भगवान काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है । काल भैरव की इच्छा के बिना कोई भी काशी में प्रवेश नहीं कर...

मकर संक्रांति का महत्व

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मकर संक्रांति का पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर मनाया जाता है । मकर संक्रांति के दिन प्रयाग, काशी, गंगा सागर, मथुरा इत्यादि धार्मिक स्थानों में भक्त लोग स्नान दान इत्यादि धार्मिक कार्यों को बड़ी श्रद्धा के साथ करते हैं । इस दिन जो भी दान दिया जाता है । वह करोड़ गुना हो जाता है । महाभारत के नायक भीष्मपितामह ने सूर्य के मकर राशि में  प्रवेश करने पर ही अपने प्राणों का त्याग किया था । मकर संक्रांति का पर्व हमारे देश के विभिन्न क्षेत्रों मे भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है जैसे उत्तर भारत में मकर संक्रांति गुजरात में उत्तरायण इत्यादि । मकर संक्रांति के भगवान सूर्य की पूजा करनी चहिये । भगवान सूर्य को तांबे के लोटे में जल, अक्षत, रोली और एक लाल फुल डालकर अर्घ्य देना चाहिए । इस दिन तिल, गुड़ का दान करना चाहिए । इस दिन तिल के बने लड्डू खाना बहुत शुभ माना जाता हैं  । मकर संक्रांति में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर दिन धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं  और रात छोटी होनी लगती हैं और सूर्य का ताप भी धीरे-धीरे बढ़ने लगता है । देवताओं का दिन मकर संक्रांति से ही शुर...

श्री रामायण जी की आरती

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आरती श्री रामायन जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ।। गावत ब्रम्हादिक मुनि नारद । बालमीक बिग्यान बिसारद ।। आरती श्री रामायन जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ।। सुक सनकादि सेष अरु सारद । बरनि पवनसुत कीरति नीकी ।। आरती श्री रामायन जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ।। गावत बेद पुरान अष्टदस । छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस ।। आरती श्री रामायन जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ।। मुनि जन धन संतन को सरबस । सार अंस संमत सबही की ।। आरती श्री रामायन जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ।। गावत संतत संभु भवानी । अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ।। आरती श्री रामायन जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ।। ब्यास आदि कबिबर्ज  बखानी । कागभुसुंडि गरुड  के ही की  ।। आरती श्री रामायन जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ।। कलिमल हरनि बिषय रस फीकी । सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ।। आरती श्री रामायन जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ।। दलन रोग भव मुरि अमी की । तात मात सब बिधि तुलसी की ।। आरती श्री रामायन जी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ।।

हनुमान जी की आरती

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आरती की जै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ।। जाके बल से गिरिवर काँपे । रोग दोष जाके निकट न झाँकें ।। अंजनि पुत्र महा बलदाई । संतन के प्रभु सदा सहाई ।। दे बीरा रघुनाथ पठाये । लंका जारि सिया सुधि लाये ।। लंका सो कोट समुद्र सी खायी । जात पवनसुत बार न लाई ।। लंका जारि असुर संहारे । सियाराम जी के काज संवारे ।। लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे । आनि सजीवन प्राण उबारे ।। पैठि पाताल तोरि जम कारे । अहिरावण की भुजा उखारे ।। बायें भुजा असुर दल मारे । दाहिने भुजा संतजन तारे । सुर नर मुनिजन आरती उतारे । जय जय जय हनुमान उचारें ।। कंचन थार कपूर लौ छाई । आरती करत अंजना माई ।। जो हनुमान जी की आरती गावै । बसि बैकुंठ परम पद पावै ।। लंका विध्वंस कियो कपिराई । तुलसीदास स्वामी कीरति गाई ।। आरती की जै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ।।  

शिवजी की आरती

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ऊँ जय शिव ओमकारा हर प्रभु जय शिव ओमकारा   । ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ।। टेक ।। एकानन चतुरानन पंचानन राजै । हंसानन गरुणासन वृषवाहन साजे ।। जय ।। दो भुज चार चर्तुभुज दश भुज ते सोहे । तीनो रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहे ।। जय ।। अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी । चन्दन मृगमद सोहै  भाले  शशिधारी ।। जय ।। श्वेताम्बर, पीताम्बर, ब्राघम्बर अंगे । ब्रम्हादिक सनकादिक भुतादीक संगे ।। जय ।। करके मध्य-कमण्डल चक्र त्रिशुल धर्ता । जगकरता जगहरता जगपालन कर्ता ।। जय ।। ब्रम्हा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका । प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनो एका ।। जय ।। त्रिगुण शिव स्वामी की आरती जो कोई नर गावैं । कहत शिवानन्द स्वामी मन वांछित फल पावे ।। जय ।।

श्री गणेश जी की आरती

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जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा । माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।। एक दन्त दयावन्त, चार भुजा धारी । माथे सिंदूर सोहे, मूस की सवारी ।। जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा । माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।। पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा । लडूवन का भोग लगे, संत करें सेवा  ।। जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा । माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।। अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया । बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ।। जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा । माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।। सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा । माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।। जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा । माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।। दीनन की लाज रखो, शंभु सूतकारी । कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी ।। जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा । माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।।

कृष्ण भगवान की आरती

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आरती कुन्ज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।। टेक ।। गले में बैजंती माला, बजावे मुरली मधु बाला, श्रवण में कुंडल झलकाला, नंद  के नंद श्री आनन्द कंद, मोहन बृज चंद, राधिका रमण बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की, गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली, लतन में ठाड़े वनमाली, भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक चंद्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की, कनकमय मोर मुकुट विलसे, देवता दर्शन को तरसे, गगन सो सुमन राशि बरसे, बजे मुरचंग , मधुर मृदंग ग्वलिनि संग, अतुल रति गोप कुमारि की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की, जहा से प्रकट भयी गंगा, कलुष कलि हरिणी श्री गंगा, स्मरण से होत मोह भंगा, बसी शिव शीश, जटा के बीच, हरै अघ किच, चरण छवि श्री बनवारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की, चमकती उज्जवल तट रेणु, बज रही वृंदावन वेणु, चंहु दिशी गोपी ग्वाल धेनु, हंसत मृदु-मंद, चांदनी चंद कटत भव फंद, टेर सुन दीन भिखारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की, आरती कुन्ज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

दुर्गा जी की आरती

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जय अम्बे गौरी, जय श्यामा गौरी । तुमको निशदिन ध्यावत हरि ब्रम्हा शिवजी ।। टेक ।। मांग सिंदूर विराजत टीको मृगमद् को । उज्जवल से दोउ नैना चन्द्र बदन नीको ।। जय ।। कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै । रक्त पुष्प गल माला कंठन पर साजै ।। जय ।। केहरि वाहन राजत खड्ग खप्पर धारी । सुर नर मुनिजन सेवत तिनके दुखहारी ।। जय ।। कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती । कोटिक चन्द्र दिवाकर राजत सम ज्योति ।। जय ।। शुम्भ निशुम्भ विडारे महिषासुर घाती । धूम्र विलोचन नैना निशदिन मदमाती ।। जय ।। चण्ड-मुण्ड संहारे शोणित बीज हरे । मधु कैटभ दोउ मारे सुर भयहिन करे ।। जय ।। ब्रम्हाणी रुद्राणी तुम कमला रानी । आगम निगम बखानी तुम शिव पट रानी ।। जय ।। चौसठ योगिनी गावत नृत्य करत भैरु । बाजत ताल मृदंगा अरु बाजत डमरु ।। जय ।। तुम ही जग की माता तुम ही हो भरता । भक्तन की दुख हरता सुख सम्पती करता ।। जय ।। भुजा चार अति शोभित वर मुद्रा धारी । मनवांछित फल पावत सेवत नर नारी ।। जय ।। कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती । श्री मालकेतु मे राजत कोटि रतन ज्योति ।। जय  ।। श्री अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावे । कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम...